वर्ष 2019-20 से 2025-26 तक राज्य में 1,440 से अधिक फिल्मों की शूटिंग गतिविधियां हुई, सब्सिडी का दायरा बढ़ा, रिपोर्ट- धीरज सजवाण
देहरादून: उत्तराखंड सरकार की फिल्म नीति का राज्य को फायदा मिल रहा है. कभी सिर्फ पहाड़, झरने और खूबसूरत वादियों के लिए पहचाना जाने वाला उत्तराखंड अब सिनेमा की दुनिया में भी अपनी अलग पहचान बना रहा है. राज्य की प्राकृतिक खूबसूरती लंबे समय से फिल्म निर्माताओं को आकर्षित करती रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बदली नीतियों, बढ़ी सब्सिडी और शूटिंग की आसान होती प्रक्रिया ने इस आकर्षण को एक नए उद्योग में बदलने की दिशा में आगे बढ़ाया है. फिल्मों, टीवी सीरियल और म्यूजिक प्रोजेक्ट्स की शूटिंग बढ़ने के साथ निवेश, स्थानीय रोजगार और कारोबार के अवसर भी बढ़े हैं. अब उत्तराखंड सिर्फ फिल्मों की शूटिंग के लिए पसंद की जाने वाली लोकेशन नहीं, बल्कि एक उभरते हुए फिल्म हब के तौर पर अपनी जगह बना रहा है.
₹1,759 करोड़ से ज्यादा का निवेश: उत्तराखंड में फिल्म उद्योग की बढ़ती गतिविधियों का असर निवेश के आंकड़ों में भी साफ दिखाई देता है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2022-23 में फिल्म उद्योग से जुड़ा निवेश ₹379.75 करोड़ रहा. 2023-24 में यह ₹332.01 करोड़, 2024-25 में ₹531.62 करोड़ और 2025-26 में ₹420.72 करोड़ रहा. वहीं वित्तीय वर्ष 2026-27 में 1 अप्रैल से 19 सितंबर 2026 तक ₹95.52 करोड़ का निवेश दर्ज किया गया है. इन आंकड़ों को जोड़ने पर इस अवधि में कुल निवेश ₹1,759.62 करोड़ बैठता है. यानी उत्तराखंड में फिल्म उद्योग अब सिर्फ शूटिंग और मनोरंजन तक सीमित गतिविधि नहीं रह गया है, बल्कि राज्य में करोड़ों रुपये का आर्थिक कारोबार पैदा करने वाला क्षेत्र बन रहा है. 18 प्रतिशत की दर से देखें तो इस निवेश पर करीब ₹316.73 करोड़ के GST के बराबर कारोबार बनता है.
उत्तराखंड में फिल्म उद्योग का निवेश: उत्तराखंड में फिल्म उद्योग में निवेश हालांकि उतार-चढ़ाव वाला रहा है, ये 2024-25 में 500 करोड़ से ऊपर रहा तो साल 2025-26 में ₹420.72 करोड़ रहा. सालवार बात करें तो 2022-23 में फिल्म निर्माताओं ने उत्तराखंड में ₹379.75 करोड़ का निवेश किया था. 2023-24 में हालांकि निवेश थोड़ा घाट लेकिन ये फिर भी 300 करोड़ से ज्यादा ₹332.01 करोड़ रहा.
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2024-25 में फिल्म उद्योग में उत्साहजनक निवेश देखने को मिला और पहली बार ये ₹531.62 करोड़ रहा. 2025-26 में निवेश करीब 100 करोड़ कम रहा और ये ₹420.72 करोड़ रहा. 2026-27 में अभी तक फिल्म उद्योग में निवेश ₹95.52 करोड़ हो चुका है. इस तरह कुल निवेश ₹1,759.62 करोड़ रहा. इस दौरान 1 अप्रैल से 19 सितंबर 2026 तक 18% की दर से अनुमानित GST ₹316.73 करोड़ बना.
1,440 से ज्यादा शूटिंग गतिविधियां: उत्तराखंड में फिल्म शूटिंग का दायरा भी लगातार बढ़ा है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2019-20 से 2025-26 तक राज्य में 1,440 से अधिक फिल्मों की शूटिंग और NOC से संबंधित गतिविधियां दर्ज की गई हैं. वहीं उत्तराखंड सूचना विभाग और फिल्म विकास परिषद से जुड़े नोडल अधिकारी केएस चौहान के मुताबिक पिछले दो वर्षों में ही राज्य में 550 से ज्यादा फिल्मों, टीवी सीरियल और म्यूजिक एल्बम से जुड़े प्रोजेक्ट्स की शूटिंग हुई है.ये स्थान बने शूटिंग के लिए मनपसंद: देहरादून, मसूरी, चोपता, चकराता, टिहरी, नैनीताल और रानीखेत जैसे स्थान फिल्म निर्माताओं की पसंद बन चुके हैं. उत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरता, हिमालयी क्षेत्र, नदियां, झीलें, जंगल और धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल किसी भी फिल्म की कहानी को अलग विजुअल पहचान देने का काम करते हैं. यही वजह है कि बड़े प्रोडक्शन भी अब उत्तराखंड की ओर रुख कर रहे हैं. ‘बॉर्डर 2’ जैसी बड़ी फिल्म की शूटिंग देहरादून में हुई, जबकि ‘ताज स्टोरी’ जैसे प्रोजेक्ट्स की शूटिंग भी उत्तराखंड में की गई. यानी उत्तराखंड की वादियां अब सिर्फ पर्यटन की तस्वीरों में नहीं, बल्कि बड़े पर्दे की कहानियों में भी लगातार नजर आ रही हैं.सब्सिडी बढ़ी, क्षेत्रीय सिनेमा को सहारा: उत्तराखंड में फिल्म निर्माण को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से सब्सिडी का दायरा बढ़ाया गया है. उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद के नोडल अधिकारी केएस चौहान के मुताबिक-

पहले गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी जैसी क्षेत्रीय फिल्मों के लिए सब्सिडी की अधिकतम सीमा ₹25 लाख थी, जिसे बढ़ाकर अब ₹2 करोड़ कर दिया गया है. इसका असर क्षेत्रीय सिनेमा में भी दिखाई दे रहा है. पहले जहां एक साल में करीब तीन-चार क्षेत्रीय फिल्में बनती थीं, वहीं अब प्रतिवर्ष करीब 15 से 20 क्षेत्रीय फिल्मों की शूटिंग हो रही है. हिंदी और अन्य भाषाओं की फिल्मों के लिए सब्सिडी की अधिकतम सीमा भी बढ़ाकर ₹3 करोड़ की गई है. वहीं नए और अनछुए शूटिंग डेस्टिनेशन पर फिल्म बनाने वाले निर्माताओं के लिए मुख्य सब्सिडी के अतिरिक्त 5 प्रतिशत अतिरिक्त प्रोत्साहन का प्रावधान है.
-केएस चौहान, नोडल अधिकारी, उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद-वित्तीय वर्ष 2021-22 से 2025-26 तक राज्य में 52 फिल्मों को अनुदान दिया गया है. इनमें हिंदी के साथ गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी और अन्य उत्तराखंडी भाषाओं की फिल्में शामिल हैं. अकेले 2025-26 में ही 25 फिल्मों को अनुदान दिया गया.
फिल्म सब्सिडी में बदलाव: उत्तराखंड सरकार ने फिल्म सब्सिडी नियमों में बदलाव किया. इसके तहत क्षेत्रीय फिल्मों को ₹2 करोड़ तक सब्सिडी दी जा रही है.
हिंदी/अन्य पात्र भाषाओं की फिल्मों को ₹3 करोड़ तक सब्सिडी मिल रही है. नए लोकेशन पर शूटिंग करने पर 5% अतिरिक्त प्रोत्साहन मिल रहा है. 2021-22 से 2025-26 के बीच 52 फिल्मों को अनुदान दिया गया है. 2025-26 के दौरान 25 फिल्मों को अनुदान मिला है.फिल्म नीति ने बढ़ाई सुविधाएं: उत्तराखंड फिल्म नीति-2024 ने राज्य में फिल्म निर्माण को एक नई दिशा देने का काम किया है. नीति में सिंगल विंडो व्यवस्था, प्रोत्साहन और अनुदान, फिल्म पुरस्कार, प्रशिक्षण, छात्रवृत्ति, फिल्म सिटी और पोस्ट-प्रोडक्शन सुविधाओं जैसे प्रावधान किए गए हैं. इसका मकसद उत्तराखंड को सिर्फ फिल्मों की शूटिंग की जगह नहीं, बल्कि फिल्म निर्माण के व्यापक केंद्र के तौर पर विकसित करना है. उत्तराखंड सूचना विभाग में संयुक्त निदेश और उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद के नोडल अधिकारी केएस चौहान के मुताबिक-
सिंगल विंडो व्यवस्था से फिल्म निर्माताओं के लिए शूटिंग की अनुमति और NOC की प्रक्रिया आसान हुई है. देहरादून और पंतनगर की हवाई कनेक्टिविटी, बेहतर सड़कें, होटल और होम-स्टे की उपलब्धता से पहाड़ी क्षेत्रों में शूटिंग करना भी आसान हुआ है. इसके साथ ही चेन्नई और हैदराबाद में हुई बैठकों के बाद दक्षिण भारत और विदेशी फिल्म निर्माताओं को भी उत्तराखंड में शूटिंग के लिए आकर्षित करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं.
-केएस चौहान, नोडल अधिकारी, उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद-
चौहान के अनुसार फिल्म शूटिंग बढ़ने से स्थानीय स्तर पर रोजगार और कारोबार के अवसर बढ़े हैं. फिल्म यूनिट के साथ स्थानीय कलाकारों, होटल व्यवसायियों, ट्रांसपोर्टर्स और अन्य सेवा क्षेत्र को भी काम मिलता है. उत्तराखंड में फिल्म गतिविधियों का विस्तार राज्य की अर्थव्यवस्था के साथ स्थानीय संस्कृति को भी लाभ पहुंचा रहा है.
शूटिंग से स्थानीय बाजार को फायदा: किसी फिल्म की यूनिट जब उत्तराखंड के किसी शहर या पहाड़ी क्षेत्र में पहुंचती है, तो उसका असर सिर्फ कैमरे और कलाकारों तक सीमित नहीं रहता. फिल्म यूनिट के साथ होटल और होम-स्टे में कमरे बुक होते हैं. स्थानीय वाहनों की जरूरत पड़ती है. कैटरिंग का काम मिलता है और कई तरह की स्थानीय सेवाएं सीधे फिल्म प्रोडक्शन से जुड़ जाती हैं. स्थानीय कलाकारों और तकनीशियनों के लिए भी काम के अवसर पैदा होते हैं. कैमरा, लाइट, साउंड, मेकअप, कॉस्ट्यूम और प्रोडक्शन से जुड़े स्थानीय लोगों को प्रोजेक्ट के अनुसार काम मिल सकता है. यानी एक फिल्म की शूटिंग अपने साथ सिर्फ कैमरा नहीं लाती, बल्कि स्थानीय बाजार के कई हिस्सों के लिए काम लेकर आती है.
करीब 20 से 22 वर्षों से उत्तराखंड में पत्रकारिता और फिल्म निर्माण से जुड़े तरुण रावत का मानना है कि-
राज्य को केवल एक ‘फिल्म सिटी’ बनाने की बजाय ‘फिल्म स्टेट’ के रूप में विकसित किया जाना चाहिए. उत्तराखंड की भौगोलिक विविधता ही इसकी सबसे बड़ी ताकत है. गढ़वाल, कुमाऊं, पहाड़, मैदान, नदियां और अलग-अलग तरह के प्राकृतिक क्षेत्र राज्य को शूटिंग के लिए एक खास पहचान देते हैं. ऐसे में किसी एक शहर में फिल्म सिटी विकसित करने के बजाय राज्य के अलग-अलग हिस्सों में छोटे फिल्म फैसिलिटेशन सेंटर बनाए जाने चाहिए.
-तरुण रावत, फाउंडर, जेएसआर प्रोडक्शन-उनका सुझाव है कि पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी, हल्द्वानी और पिथौरागढ़ जैसे क्षेत्रों में मिनी फिल्म हब विकसित किए जाएं. यहां बेसिक शूटिंग उपकरण, एडिटिंग सुइट, वैनिटी वैन, स्थानीय क्रू और लॉजिस्टिक्स की सुविधा उपलब्ध हो तो बाहरी और स्थानीय दोनों फिल्म निर्माताओं को फायदा मिल सकता है. उत्तराखंड को फिल्म सिटी नहीं बल्कि फिल्म स्टेट के रूप में विकसित करने की जरूरत है. राज्य के अलग-अलग हिस्सों में छोटे फैसिलिटेशन सेंटर हों, जहां लोकल क्रू, उपकरण और लॉजिस्टिक्स उपलब्ध हों. इससे शूटिंग का लाभ सिर्फ कुछ शहरों तक सीमित नहीं रहेगा.
सब्सिडी की प्रक्रिया भी आसान हो: तरुण रावत के मुताबिक नई फिल्म नीति में सब्सिडी बढ़ाना सकारात्मक कदम है, लेकिन इसके साथ सब्सिडी मिलने की प्रक्रिया को भी तेज और समयबद्ध करना जरूरी है. उनका कहना है कि-
शूटिंग पूरी होने के बाद सब्सिडी मिलने में देरी छोटे और स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं के लिए चुनौती बन सकती है. बड़े प्रोडक्शन हाउस के मुकाबले छोटे फिल्म मेकर सीमित बजट में काम करते हैं. ऐसे में समय पर मिलने वाली आर्थिक सहायता उनके लिए महत्वपूर्ण होती है. स्थानीय कलाकारों और क्रू को काम देने की व्यवस्था को और प्रभावी बनाने के लिए एक पारदर्शी और प्रमाणित लोकल क्रू डेटाबेस भी जरूरी है.
-तरुण रावत, फाउंडर, जेएसआर प्रोडक्शन-
इसमें कलाकारों के साथ तकनीशियन, लाइटमैन, ड्राइवर, वैनिटी वैन संचालक और लाइन प्रोड्यूसर तक शामिल किए जा सकते हैं. ऐसा सिस्टम तैयार होने पर बाहर से आने वाले फिल्म निर्माताओं को उत्तराखंड में ही शूटिंग के लिए तैयार स्थानीय टीम मिल सकेगी और स्थानीय युवाओं के लिए काम के अवसर भी बढ़ेंगे.
पहाड़ों में थिएटर की कमी, फिल्म एजुकेशन पर भी जोर: उत्तराखंड के क्षेत्रीय सिनेमा के सामने एक बड़ी चुनौती फिल्मों के प्रदर्शन से जुड़ी है. पहाड़ी क्षेत्रों और छोटे कस्बों में सिनेमाघरों और मल्टीप्लेक्स की संख्या सीमित है. तरुण रावत के मुताबिक जब तक स्थानीय फिल्मों के लिए पर्याप्त स्क्रीन उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी फिल्मों को अपने दर्शकों तक पहुंचाने की चुनौती बनी रहेगी. उन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों में 50 से 100 सीट वाले छोटे डिजिटल थिएटर विकसित करने का सुझाव दिया है. ऐसे छोटे थिएटर स्थानीय फिल्मों को उनके अपने दर्शकों तक पहुंचाने का माध्यम बन सकते हैं.
दूसरी तरफ फिल्म इंडस्ट्री के विस्तार के साथ प्रोफेशनल ट्रेनिंग की जरूरत भी बढ़ रही है. अभिनय, निर्देशन, सिनेमैटोग्राफी, एडिटिंग, साउंड इंजीनियरिंग और VFX जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण उपलब्ध होने से स्थानीय युवाओं के लिए फिल्म इंडस्ट्री में करियर के नए रास्ते खुल सकते हैं. तरुण रावत का सुझाव है कि-
राज्य में मास कम्युनिकेशन के साथ फिल्म, निर्देशन, एक्टिंग, सिनेमैटोग्राफी और साउंड इंजीनियरिंग के डिप्लोमा और डिग्री कोर्स शुरू किए जाएं। शूटिंग बढ़ने के साथ यदि स्थानीय युवाओं को तकनीकी प्रशिक्षण भी मिले, तो बाहरी फिल्म यूनिट्स में उत्तराखंड के युवाओं की भागीदारी और ज्यादा बढ़ाई जा सकती है.
-तरुण रावत, फाउंडर, जेएसआर प्रोडक्शन-
राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान: उत्तराखंड को राष्ट्रीय स्तर पर फिल्म अनुकूल राज्य के तौर पर पहचान भी मिल चुकी है. 66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में उत्तराखंड को Most Film Friendly State का सम्मान मिला था. वहीं 68वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में राज्य को Most Film Friendly State – Special Mention दिया गया. यह सम्मान उत्तराखंड में फिल्म निर्माण के लिए बन रहे माहौल और फिल्म निर्माताओं के लिए तैयार की जा रही सुविधाओं की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान को दर्शाता है.
अब इसी पहचान को आगे बढ़ाते हुए सरकार का फोकस राज्य को सिर्फ शूटिंग डेस्टिनेशन तक सीमित न रखकर फिल्म निर्माण के व्यापक केंद्र के रूप में विकसित करने पर है. उत्तराखंड फिल्म विकास परिषद की ओर से पहली बार उत्तराखंड फिल्म पुरस्कार-2024 एवं 2025 का आयोजन भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. इसके तहत वर्ष 2024 और 2025 में उत्तराखंड में निर्मित या फिल्मांकित फिल्मों के साथ उत्तराखंड की क्षेत्रीय बोलियों, हिंदी और संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल अन्य भारतीय भाषाओं में बनी फिल्मों को सम्मानित किया जाएगा.
अब चुनौती शूटिंग से आगे बढ़ने की: उत्तराखंड में फिल्म उद्योग का बदलता स्वरूप अब आंकड़ों में भी दिखाई दे रहा है. एक तरफ पांच साल की अवधि में ₹1,759 करोड़ से ज्यादा का निवेश. दूसरी तरफ 1,440 से ज्यादा शूटिंग और NOC गतिविधियां, पिछले दो वर्षों में 550 से ज्यादा फिल्म, टीवी और म्यूजिक प्रोजेक्ट्स और क्षेत्रीय फिल्मों के लिए ₹2 करोड़ तक की सब्सिडी. ये आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड में फिल्म निर्माण का दायरा तेजी से बढ़ा है. लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे अहम हिस्सा सिर्फ बड़े फिल्म प्रोजेक्ट्स का उत्तराखंड आना नहीं है. असली बदलाव तब दिखाई देगा, जब इन प्रोजेक्ट्स के साथ उत्तराखंड के कलाकार, तकनीशियन, युवा, होटल कारोबारी, ट्रांसपोर्टर और स्थानीय सेवा क्षेत्र लगातार और बड़े स्तर पर जुड़ेंगे. इसके लिए लोकल कलाकारों और तकनीशियनों का मजबूत डेटाबेस, फिल्म प्रशिक्षण, पोस्ट-प्रोडक्शन सुविधाएं, पहाड़ी जिलों में फिल्म फैसिलिटेशन सेंटर और क्षेत्रीय फिल्मों के लिए थिएटर जैसी जरूरतें महत्वपूर्ण हैं.
शूटिंग के लिए उत्तराखंड के पास है हर लोकेशन: उत्तराखंड के पास वह चीज पहले से मौजूद है, जिसके लिए दुनिया भर के फिल्म निर्माता लोकेशन तलाशते हैं. हिमालय, पहाड़, नदियां, झीलें, जंगल, गांव, धार्मिक स्थल और बदलते हुए प्राकृतिक दृश्य. अब सरकार की नीति और निजी निवेश इस प्राकृतिक ताकत को फिल्म इंडस्ट्री के आर्थिक ढांचे से जोड़ने का काम कर रहे हैं. अगर इसी रफ्तार से फिल्म निर्माण बढ़ता है और स्थानीय प्रतिभाओं को इससे जोड़ा जाता है, तो आने वाले समय में उत्तराखंड की पहचान सिर्फ फिल्मों की शूटिंग के लिए मशहूर राज्य के तौर पर नहीं होगी. यहां के युवा कैमरे के सामने ही नहीं, कैमरे के पीछे भी नजर आएंगे.
फिल्म निर्माण उद्योग में स्थानीय युवाओं के लिए बनेंगे अवसर: स्थानीय कलाकारों के साथ सिनेमैटोग्राफर, एडिटर, साउंड इंजीनियर, VFX आर्टिस्ट, लाइन प्रोड्यूसर और दूसरे तकनीकी विशेषज्ञों के लिए भी अपने ही राज्य में करियर के रास्ते खुलेंगे. यानी उत्तराखंड की कहानी अब सिर्फ “यहां फिल्म की शूटिंग हुई” तक सीमित नहीं रह गई है. कहानी उस मुकाम की ओर बढ़ रही है जहां फिल्म उत्तराखंड में आए, शूट हो, यहां के लोगों को रोजगार दे, यहां की संस्कृति और कहानियों को देश-दुनिया तक पहुंचाए और फिल्म निर्माण की एक पूरी श्रृंखला इसी राज्य में तैयार हो. यही बदलाव उत्तराखंड को आने वाले समय में शूटिंग लोकेशन से एक मजबूत फिल्म हब और फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक बड़े राज्य के रूप में स्थापित करने की दिशा में सबसे बड़ा कदम साबित हो सकता है.
आगे की प्रमुख जरूरतें: फिल्म उद्योग को बढ़ावा देने के लिए लोकल कलाकारों और तकनीशियनों का डेटाबेस तैयार करना होगा. शूटिंग और सब्सिडी प्रक्रिया को समयबद्ध और आसान करना होगा. राज्य के पहाड़ी जिलों में फिल्म फैसिलिटेशन सेंटर खोलने होंगे. पोस्ट-प्रोडक्शन सुविधाओं का विस्तार करना होगा. अधिक संख्या में फिल्म और तकनीकी प्रशिक्षण संस्थान खोलने होंगे. क्षेत्रीय फिल्मों के लिए छोटे थिएटर बनाने होंगे. निजी निवेश के लिए आसान और पारदर्शी प्रक्रिया रखनी होगी. स्थानीय युवाओं की फिल्म प्रोजेक्ट्स में भागीदारी हर कदम पर बढ़ानी होगी.
फिल्म शूटिंग के लिए उत्तराखंड की लोकेशन अपनी पहचान बना चुकी हैं. अब जरूरत इस पहचान को एक ऐसे मजबूत फिल्म इकोसिस्टम में बदलने की है, जहां शूटिंग के साथ रोजगार हो, निवेश के साथ स्थानीय कारोबार बढ़े. नीति के साथ प्रतिभाओं को अवसर मिले और उत्तराखंड की अपनी कहानियां देश-दुनिया के बड़े पर्दे तक पहुंचें.
