मेरा परम सौभाग्य होगा कि मैं कभी ……. : डॉ. सुशील कोटनाला

आदरणीय जय प्रकाश जी नमस्कार!आपके पूज्य पिताजी के द्वारा समाज की महान सेवा की गई।वे तरुणावस्था में ही गृह त्याग कर योग्य गुरु की ढूॅंढ में निकल गए। उनकी गुरु के प्रति समर्पित निष्ठा ने उन्हें मध्य प्रदेश में योग्य गुरु से मिला दिया और गुरु के सानिध्य से ऋषि-जीवन में प्रवेश पाकर समाज को प्रकाशित करते हुए एक ईश्वर की उपासना के पथ पर अग्रसारित होकर वे समाज में व्याप्त पाखण्ड और कुरीतियों का परिहार करते रहे। उन्होंने न केवल मध्यप्रदेश में अपितु अपनी जन्मभूमि में भी धर्म का प्रकाश फैलाया।वे हिन्दू समाज की
जटिल जाति-व्यवस्था को सहज वैदिक-जीवन में परिणित करते रहे, जिसमें सभी मनुष्यों को ब्राह्मणत्व की प्राप्ति अनिवार्य रूप से करनी है। ब्राह्मण होना जन्माधारित उपलब्धि न होकर मनुष्यता के सर्वोच्च और सर्वश्रेष्ठ सद्गुणों की प्राप्ति की योग्यता तथा पात्रता है जिसे हम साधना और उपासना भी कहते हैं।जन्म से ही कोई पीएचडी/ डीएससी/ डीलिट नहीं हो सकता इसके लिए गहन-अध्ययन करते हुए उपाधियों को अर्जित करना होता है। ब्राह्मण, आचार्य,ऋषि, महर्षि, राजर्षि,देवर्षि ये सब साधना से अर्जित की हुई उपाधियां हैं।फोकट में पोंगा पंडितों की तरह अपने आगे या पीछे जोड़ लेना ब्राह्मण या ऋषि होना कदापि नहीं है।आपके पूज्य पिताजी सत्य निष्पक्ष कोमल आनंदानंद जी महाराज जी द्वारा ऋषित्त्व प्राप्ति की साधना की गई और करवाई भी गई।आपके द्वारा उनके वैदिक आश्रम में यह पुनीत कार्य उनके ब्रह्मलीन होने के पश्चात भी अविरल और अविराम वर्तमान बना हुआ है। मेरा परम सौभाग्य होगा कि मैं कभी सामाजिक समरसता तथा सद्भाव के इस पवित्र आश्रम के दर्शन करने उत्तराखंड के पौड़ी जनपद में बैजरों के निकट स्थित गुरफली मित्रों सहित पहुॅंच सकूॅं। श्री रमेश उनियाल जी(गाॅंव-गाॅंव में समरसता भोज के आकांक्षी)भी इस पवित्र यात्रा को करने के महत् अभिलाषी हैं, सहयात्री के रूप में उनका पावन सानिध्य भी मुझे प्राप्त होगा।सादर——