हे भारत!विगत तीन दशकों से तेरा जितना नैतिक पतन हुआ है उतना तो अनेक शताब्दियों में भी नहीं हुआ है।दासता के काल खण्ड में भी इतना चारित्रिक पतन नहीं हुआ था। हिन्दू धर्म अपनी उच्च नैतिकता के लिए जाना जाता है, इसमें जैन, बौद्ध तथा सिक्ख पंथ के भी उच्च नैतिक मूल्य सहज समाहित हैं।आज उदारीकरण के पश्चात विकराल बाजारवाद ने हमारी परिवार व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया है। पति-पत्नी अपने दाम्पत्य की धुरी से भटक रहे हैं तो परिवार और कुटुम्ब कैसे बचेंगे?यह ऐसे ही है जैसे पृथ्वी अपनी धुरी पर न रहे तो वह या तो सूर्य में विलीन हो जाएगी या अन्तरिक्ष में भटककर नष्ट हो जाएगी। परिवार का समाजशास्त्रीय अध्ययन भारत की प्रकृति में नहीं है, भारत की प्रकृति धर्म आधारित मानदण्डों से संचालित होती रही है और इसकी विवाह संस्था अत्यन्त पवित्र, वैज्ञानिक है। किन्तु आज जब पति-पत्नी के जघन्यतम अपराधों ने विवाह संस्था से ही विश्वास उठा दिया है, बौद्धिकता और तर्क से घर-परिवार नहीं चलते।परिवार चलाने के लिए विश्वास तथा भावनात्मकता चाहिए और यह विवाह के प्रथम दिन से ही चाहिए, इसके लिए यौन-शुचिता चाहिए। यदि यौन-शुचिता किसी एक में नहीं है तो कब विवाह संस्था भंग हो जाएगी कुछ कहा नही जा सकता। पितृ सत्तात्मक परिवार व्यवस्था हो या मातृसत्तात्मक परिवार व्यवस्था दोनों में से कोई एक अपनाने के पश्चात उसके प्रति निष्ठा और समर्पण तो चाहिए ही। बराबरी के नाम पर मन की दुर्बलताओं से पराजित जीवन वृद्धावस्था तक सब कुछ खो चुका होता है और परिणाम घोर निराशा के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। इंटरनेट के भटकाव से जुड़े स्मार्टफोन हमारे बच्चों के पास हैं। तरुणाई लड़खड़ा रही है और इसके लिए दोषी बच्चे और तरुण कदापि नहीं हैं—– हम वरिष्ठ नागरिक ही दोषी हैं और इसका दुष्परिणाम हम बुढ़ापे के अकेलेपन के रूप में भोग रहे हैं।आज हम यूरोप की तरह बुढ़ापे तक परिवार खोने की स्थिति में आ गए हैं जबकि यूरोप भारतीय जीवन मूल्यों को अपनाकर संभलने का सार्थक प्रयास कर रहा है।हे भारत तेरा आदर्श सदैव चरित्रवान स्त्री-पुरुष ही रहने वाले हैं, चरित्र से स्खलित लम्पट स्त्री-पुरुष परिवार और समाज में कोई भी रचनात्मक कार्य नहीं कर सकते। चरित्र से गिर जाने की अपेक्षा मृत्यु का वरण करना श्रेयस्कर है।हे भारतीय नारी तेरा चरित्र ही भारतीय परिवार व्यवस्था की सुरक्षा करता रहा है, पुरुषों की अनेक दुर्बलताओं में भी तुमने सदैव पतिव्रता धर्म का निर्वहन किया है और इसीलिए भारत घोर दासता में भी बचा रह सका है। भारत की संस्कृति यूनान,मिश्र और रोम की तरह यदि नहीं मिट पाई तो उसका सबसे बड़ा कारण भारतीय नारी जो हिन्दू नारी का पर्याय है उसका अटूट चरित्र और उससे निष्पन्न पतिव्रता धर्म रहा है ….. पुरुष इस भूमिका में यौवन की ढलान पर आकर पहुंचकर वैराग्य लेकर किनारे होता रहा और हमारी स्त्रियां परिवार तथा कुटुम्ब को संभालती रही हैं।हे भारत की नारी! क्या आज तू अपने कर्तव्य पालन की अधिकता से क्लांत होकर विद्रोहिणी बन चुकी है — जिसके परिणामस्वरूप वाग्दान के पश्चात भावी पति को धोखा देने से लेकर अवैध सम्बन्धों में लिप्त रहकर पतियों की नृशंस हत्याओं से समाचार पत्र पटते जा रहे हैं। मां जो कभी भी कुमाता हो ही नहीं सकती,यह भाव मादा पशुओं से लेकर मनुष्य (नारी)तक प्राकृतिक रूप से सभी में समान रूप से विद्यमान है। किन्तु इस भौतिकवाद की चपेट में आकर विक्षिप्ता सा आचरण कर मां न केवल बच्चों को छोड़कर भाग रही हैं अपितु अवरोध समझकर बच्चों की हत्या भी कर रही हैं।यह कौन सी आधुनिकता का वरण हो रहा है? आज पुरुषों वाले जघन्यतम अपराधों से स्त्रियां भी प्रतिस्पर्धा कर रही हैं,यह स्त्री सशक्तिकरण है या स्त्री का अपनी गरिमा से गिरना है? आनन्द से परिपूर्ण विश्व का मार्ग आनन्द से परिपूर्ण घर-परिवार से होकर ही गुजरेगा और इसकी धुरी हमारी माताएं ही होंगी जहां बच्चे निश्चिंत होकर ममता की छाया में परिपूर्ण मानव बन सकेंगे ——क्या बाजारवाद ऐसा होने देगा? ……
