भारत की राजधानी में हूॅं। अद्भुत विषमता है,नर्क तथा स्वर्ग का अन्तर इस महानगर में सहज दृष्टिगोचर होता है।एक ओर निर्धनता,विपन्नता से पीड़ित बस्तियां हैं और दूसरी ओर सम्पन्न, समृद्ध आत्ममुग्ध श्रीमंतों की वैभवशाली अट्टालिकाएं हैं और इनके मध्य कहीं अन्यमनस्क मध्यम वर्ग है।हम जैसे मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चों को दिल्ली में उच्च शिक्षा दिलवाना और उनके लिए उचित आवासीय व्यवस्था करवाना कठिन है …… दिल्ली अस्वस्थ हो गया है और उसके निम्न तथा मध्यम वर्गीय परिवारों की आवासीय व्यवस्था नारकीय वातावरण से पीड़ित है।घुटन भरे छोटे कमरे और उन तक पहुंचने वाली दुर्गन्धयुक्त संकीर्ण वीथिकाएं(अवरुद्ध मल-मूत्र एवं पंक-परिपूरित नालियों वाली गलियां)हर समय दंश मारती सी प्रतीत होती हैं। सरकार को दिल्ली सहित सभी महानगरों और नगरों पर जनसंख्या दबाव को रोकना ही होगा —-इसके लिए ग्रामीण अंचलों तथा उपनगरीय क्षेत्रों का संतुलित आधुनिक विकास आवश्यक है। संतुलित आधुनिक विकास से आशय बाजार का विस्तार कदापि नहीं है ……. इसका आशय मूलभूत सुविधाओं और उचित गुणवत्ता से है।सहज शान्त जीवन के लिए बाजार की तड़क-भड़क से अधिक महत्त्व आधारभूत सुविधाओं और शान्त-सुरक्षित वातावरण की है; जो कि आज के किसी भी भारतीय महानगर में नहीं है। उन्मुक्त यौनाचार को आधुनिकता का पर्याय मान लेने वाले महानगर और नगर तरुणों (Z .Gen.)को नैतिकता और आचरण की शिक्षा देने में असमर्थ हैं। हमारी तरुणाई संस्कार परक शिक्षा प्राप्त कर सके, इसके लिए महानगरों तथा नगरों को आर्थिक विषमताओं से मुक्त बनाकर भौतिक और आत्मिक प्रदूषणों से भी मुक्त करने की महती आवश्यकता है अन्यथा केवल बाजार के विस्तार की चपेट में आने वाली शिक्षा की दुकानों से भारत का उन्नयन, उत्कर्ष और उत्थान होने वाला नहीं है—-
